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मातृ वंदना – भारतीय स्ववंत्रता दिवस पर साक्षी श्री का सन्देश

15 अगस्त 1947 को जवाहर लाल नेहरू ने वह भाषण दिया था जिसकी गूंज आज भी हर भारतीय के कानों में है। उन्होंने कहा था… बहुत पहले हमने भाग्य के साथ एक वादा किया था और अब वह समय आ गया है जब हम अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करेंगे। इस दिन हमें राष्ट्र की नियति से जुड़ी उस प्रतिज्ञा को याद करना चाहिए और उसे पूरा करने के सतत, अनथक प्रयास करने की शपथ लेनी चाहिए। हम प्राचीन सभ्यता और युवा राष्ट्र हैं। हम उस सभ्यता की संतति हैं जिसने अह्म ब्रह्मास्मि और वसुधैव कुटुंबकम का उद्घोष किया है।

आज मैं यह चर्चा नहीं करूंगा कि स्वतंत्रता के इतने बरसों बाद गिलास आधा भरा है या आधा खाली। इसके बजाय मैं आपको यह याद दिलाना चाहूंगा कि हम कौन हैं और हमारी सभ्यता, विरासत क्या है। किसी ने कहा कि यह एक ऐसी भूमि है जिसे सभी लोग देखना चाहते हैं, और एक बार देखने के बाद, इसके ज्ञान की एक झलक भी मिल जाए तो फिर संसार के तमाम मनोविनोद फीके से लगेंगे। यह सभ्यता मानव जाति का पालना है, विचारों का उद्गम स्थल है और धरा का एकमात्र देश है जहां उस अलौकिक, अविनाशी परम सत्य की खोज की प्यास कभी नहीं मिटी। यदि आप पूछें कि कहां मानव मन ने प्रकृति के रहस्यों पर इतना गहन चिंतन किया है,  जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर सबसे अधिक गहराई से विचार किया है, और समाधान ढूंढे हैं, तो उत्तर होगा…भारत।

हमने शून्य और दशमलव का आविष्कार किया, जिसके बिना कोई सार्थक वैज्ञानिक खोज नहीं की जा सकती थी। यदि धरती पर कोई एक ऐसी जगह है जिसने सबसे पहले अस्तित्व के रहस्यों की खोज की तो वह भारत है। जैसा कि वाल्टेयर ने कहा, “मुझे विश्वास है कि खगोल विज्ञान, ज्योतिष, जीवन, मृत्यु व पुनर्जन्म के रहस्य जैसी सभी चीजें गंगा के तट से आई हैं। यह ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि कम से कम 2500 साल पहले पाइथागोरस समोस से गंगा तट गए थे ज्यामिति सीखने के लिए… लेकिन अगर इससे काफी पहले अगर यूरोप में भारतीय ज्ञान की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं हो गई होती तो वे निश्चित रूप से इतनी लंबी यात्रा पर नहीं जाते। हम अकारण विश्वगुरु नहीं थे। केवल यहीं आपको सिखाया जाता है कि कुछ ऐसे गुण हैं जो आपको एक दिव्य-मनुष्य बनाते हैं। 

कभी इकबाल ने कहा था कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। हमारे राष्ट्रपति एस.राधाकृष्णन ने इसका सटीक कारण बताया कि यह भारत की गहन आध्यात्मिकता है, न कि कोई महान राजनीतिक संरचना या सामाजिक संगठन जिसे इसने विकसित किया है। उसी आध्यात्मिकता ने इसे समय की तबाही और इतिहास की दुर्घटनाओं का सामना करने में सक्षम बनाया है।

इस महान सभ्यता को लगातार आक्रमणों का सामना करना पड़ा, हम उपनिवेश बन गए और अंत में देश का बंटवारा हुआ। चीनी अपमान की एक सदी की बात करते हैं लेकिन हमने सहस्राब्दियों तक हमले झेले हैं। फिर भी हम कभी बदला लेने की बात नहीं करते। हमारी संस्कृति नहीं। फिर भी इतिहास से सबक लेकर 15 अगस्त का दिन हमारी प्रतिज्ञा को याद कर एक स्वर में कहने का है… फिर कभी नहीं। मातृभूमि की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करना हमारा पवित्र कर्तव्य है। इसके लिए कोई भी कीमत कम है। आज यह याद करने का दिन है कि हमारी स्वतंत्रता उन लोगों के पसीने, धैर्य, दृढ़ता और बलिदान का परिणाम है जिन्होंने स्वतंत्रता का सपना देखा और इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए वास्तविकता बनाया।

आज 74 वर्षों बाद हमें व्यक्तिगत रूप से और राष्ट्र के लिए सामूहिक रूप से नए लक्ष्य निर्धारित करने का समय आ गया है। बिना सपने के, बिना लक्ष्य के जीवन जीने लायक नहीं है। निस्संदेह हमारा सामूहिक सपना एक समृद्ध, शक्तिशाली, जागृत भारत है। इस सपने को पूरा करने में सभी का योगदान अपेक्षित है। लेकिन पश्चिम की अंधी नकल से बचना है। अपनी जड़ों को याद रखें। जैसा कि विवेकानंद ने कहा था, “यदि कोई हिंदू आध्यात्मिक नहीं है, तो मैं उसे हिंदू नहीं कहता।”

वंदे मातरम…